हिंदी दिवस पर शानदार भाषण | Hindi Diwas Par Bhashan

 आदरणीय मंचासीन अतिथिगण, सम्माननीय शिक्षकगण और मेरे प्रिय साथियों

आप सभी को सादर नमस्कार।


आज मैं हिंदी के बारे में बोलने आया हूँ।

लेकिन सच कहूँ...


हिंदी के बारे में बोलना उतना आसान नहीं है,

जितना हिंदी में बोल देना आसान है।


क्योंकि हिंदी केवल एक भाषा नहीं है।

हिंदी वह आवाज़ है, जिसमें माँ ने पहली बार हमें पुकारा था।


हिंदी वह शब्द है, जिसमें हमने पहली बार अपना दर्द बताया था।

हिंदी वह भाषा है, जिसमें हमने पहली बार किसी से कहा था


मुझे आपसे कुछ कहना है...


और शायद इसीलिए हिंदी को केवल भाषा कहना,

उसके साथ थोड़ा अन्याय करना है।

hindi diwas speech

साथियों,

हमने भाषाओं को भी एक अजीब दौड़ में खड़ा कर दिया है।


जिस भाषा में नौकरी मिले, वह बड़ी। जिस भाषा में इंटरव्यू हो, वह बड़ी।

जिस भाषा में दुनिया से बात कर सकें, वह बड़ी।


लेकिन मैं आज एक सवाल पूछना चाहता हूँ

जिस भाषा में इंसान खुद से बात करता है, उस भाषा का मूल्य कौन तय करेगा?


तालियाँ भाषा की ताकत से नहीं, भाव की ताकत से बजती हैं। और भाव...

अक्सर उस भाषा में सबसे गहरा उतरता है, जिसमें हमारा मन सोचता है।


आज हिंदी दिवस है। तो आइए आज हिंदी को बचाने की बात न करें।

क्योंकि हिंदी इतनी कमजोर नहीं है, कि उसे हमारे सहारे की जरूरत पड़े।


हमें हिंदी को बचाना नहीं है, 

हमें अपने भीतर हिंदी के लिए सम्मान बचाना है।


हिंदी सदियों से चली आ रही है। इसने राजाओं का दौर देखा है, गुलामी का दौर देखा है,

आजादी की लड़ाई देखी है, और अब यह मोबाइल की स्क्रीन पर भी जीवित है।


कलम बदली, कागज़ बदला, मंच बदला, माध्यम बदला...

लेकिन हिंदी की धड़कन नहीं बदली।


और हिंदी की सबसे बड़ी खूबसूरती क्या है? यह भाषा केवल शब्द नहीं देती...

यह शब्दों को रिश्ते देती है। अंग्रेज़ी में Mother है, लेकिन हिंदी में माँ है।


दोनों का अर्थ शब्दकोश में एक हो सकता है, लेकिन...

माँ” कहते ही शब्द नहीं, पूरा बचपन सामने आ जाता है।


यही हिंदी की ताकत है।

यह केवल अर्थ नहीं समझाती, यह एहसास समझाती है।


हम कहते हैं, मुझे तुमसे प्रेम है। लेकिन हिंदी में कभी-कभी केवल 

इतना कहना भी काफी होता है, तुम हो... इसलिए सब ठीक है।


हम कहते हैं, मैं दुखी हूँ। लेकिन हिंदी में कोई अपना पूछ दे

क्या हुआ? तो कई बार आँखें जवाब दे देती हैं।


क्यों? क्योंकि भाषा केवल कानों से नहीं सुनी जाती...

कुछ भाषाएँ सीधे दिल तक पहुँचती हैं। और हिंदी उनमें से एक है।


साथियों,

मैं यह बिल्कुल नहीं कहता कि हमें दूसरी भाषाएँ नहीं सीखनी चाहिए।


बिल्कुल सीखनी चाहिए। दुनिया की हर भाषा सीखिए।

नई भाषा सीखिए, नई तकनीक सीखिए, नई दुनिया समझिए।


लेकिन एक बात याद रखिए, दुनिया की भाषाएँ सीखते-सीखते

अपनी भाषा में सोचने की क्षमता मत खो देना।


क्योंकि पेड़ जितनी ऊँचाई पर जाता है,

उसकी जड़ें उतनी ही जरूरी हो जाती हैं।


और हमारी जड़...

हमारी अपनी भाषा है।


आज हिंदी दिवस पर

हमें हिंदी को केवल मंच पर सम्मान नहीं देना है।


हिंदी में अच्छा लिखने वाले को भी सम्मान देना है।

हिंदी में अच्छी किताब पढ़ने वाले को भी सम्मान देना है।


हिंदी में ज्ञान बाँटने वाले को भी सम्मान देना है।

और सबसे जरूरी


हिंदी बोलने में कभी झिझक महसूस न करने वाले व्यक्ति को भी सम्मान देना है।

क्योंकि भाषा की प्रतिष्ठा, सरकारी घोषणाओं से नहीं बढ़ती।


भाषा की प्रतिष्ठा तब बढ़ती है,

जब उसके अपने लोग उसे बोलते हुए गर्व महसूस करते हैं।


मैं हिंदी को किसी भाषा के खिलाफ खड़ा नहीं करना चाहता।

मेरा सपना तो इससे भी बड़ा है।


मैं चाहता हूँ, हम अंग्रेज़ी जानें, हिंदी समझें, संस्कृत का सम्मान करें,

क्षेत्रीय भाषाओं को अपनाएँ, और दुनिया की हर भाषा से कुछ अच्छा सीखें।


लेकिन अपनी भाषा को देखकर, हमारे भीतर कभी यह भावना न आए

यह तो छोटी भाषा है।


क्योंकि...भाषा छोटी-बड़ी नहीं होती,

सोच छोटी-बड़ी होती है।


और आज मैं हिंदी दिवस पर

हिंदी के नाम एक छोटी-सी बात कहना चाहता हूँ


जिस भाषा में कबीर ने सवाल पूछे, जिस भाषा में तुलसी ने आस्था लिखी,

जिस भाषा में प्रेमचंद ने समाज का चेहरा दिखाया,


जिस भाषा में दिनकर ने स्वाभिमान जगाया,

जिस भाषा में बच्चन ने जीवन को कविता बना दिया


उस भाषा को केवल एक दिन याद करना, शायद पर्याप्त नहीं है।

हिंदी दिवस साल में एक बार आता है...


लेकिन हिंदी? हिंदी तो हर उस दिन हमारे साथ रहती है,

जिस दिन हम अपने दिल की बात बिना किसी बनावट के कहते हैं।


आज इस मंच से मैं एक छोटी-सी अपील करना चाहता हूँ।

हिंदी को बचाने के लिए आंदोलन मत कीजिए।


बस...हिंदी में एक अच्छी किताब पढ़िए।


हिंदी में एक अच्छा विचार लिखिए।

अपने बच्चों से कुछ देर हिंदी में दिल खोलकर बात कीजिए।


किसी हिंदी लेखक को पढ़िए। किसी हिंदी कविता को महसूस कीजिए।

और जब कभी कोई आपसे पूछे, आप हिंदी में क्यों बोलते हैं?


तो शर्माइए मत। मुस्कुराइए...और कहिए

क्योंकि यह केवल मेरी भाषा नहीं है, यह मेरे भीतर की आवाज़ है।


अंत में बस इतना कहूँगा, हिंदी को सम्मान देने के लिए

हमें हिंदी के आगे हाथ जोड़ने की जरूरत नहीं है।


हमें बस हिंदी बोलते समय, अपना सिर झुकाना बंद करना है।

क्योंकि जिस भाषा में हमने अपने सपने देखे हैं,


जिस भाषा में हमने अपनों को पुकारा है, जिस भाषा में हमने अपने आँसू छिपाए हैं,

और जिस भाषा में हमने अपने सबसे सुंदर शब्द कहे हैं


उस भाषा पर गर्व करना किसी दिवस की औपचारिकता नहीं...

यह अपने अस्तित्व को पहचानना है।


तो आइए...

आज हिंदी दिवस पर हिंदी को केवल राजभाषा कहकर न छोड़ें।


उसे अपने व्यवहार में जगह दें, अपने विचारों में जगह दें,

अपने लेखन में जगह दें, और सबसे बढ़कर


अपने आत्मसम्मान में जगह दें।

क्योंकि...


भाषा वही महान होती है,

जिसमें शब्द खत्म होने के बाद भी भाव बाकी रह जाए।


और हिंदी... वह भाषा है,

जिसमें शब्द खत्म हो जाएँ, तो भी कहानी चलती रहती है।


हिंदी दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ।

जय हिंदी! जय हिंद!




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